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एक आज़ादी मुझे भी...


हमारा देश करोड़ों देशवासियों के बलिदान और संघर्ष से 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ. पर सवाल ये हैं कि क्या आज़ादी का मतलब सिर्फ़ ब्रिटिश हुकुमत से देश को आज़ाद कराना था..? आज़ादी हमें 15 अगस्त को आखिरी बार के लिए नहीं मिली थी.. हमें खाने-पीने की, घूमने की, बोलने की, लिखने-पढ़ने की आज़ादी मिली थी... हमे जातिवाद और असमानता से आज़ादी मिली थी.. सभी को संविधान के तहत जीने की आज़ादी मिली थी. लेकिन आज भी कई मुद्दे हैं जिससे इस देश को इस समाज को आज़ादी की जरुरत हैं.. मैं ये नही कहता कि हमें आज़ादी नहीं मिली हैं लेकिन मानवीय और सामाजिक आधार पर कई समस्याएं है जिससे देश को आज़ादी की जरुरत हैं. लाखों लोग आज भी तरह-तरह की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे है. उन्ही में से एक हैं ये मुद्दा.
“जब मनाई जाती है बाहर खुशियां.. ये जुझते रहे बंद कमरो में
कांटो से भरा हैं इनके रास्ते.. बस चाहिए हौसले जीने के”

मैं बात कर रहा हूं सीनियर सिटिजन यानि वरिष्ठ नागरिक की आज़ादी की.. जिन्हे खुद को जिंदा रखने के लिए खुद से संघर्ष करना पड़ता हैं.
आज देश में वरिष्ठ नागरिक के हालात उस पेड़ की तरह हैं कि जब तक वह फल देता है तब तक उसकी रक्षा की जाती हैं लेकिन जब वह फल देना बंद कर देता है या बूढ़ा हो जाता है तो उसे सूखने के लिए छोड़ दिया जाता हैं.
Source: TOI
आखिर क्यों हैं ऐसे हालात ? क्या वजह है जो इस उम्र में आकर अकेलेपन में जीने को मजबूर हो जाते हैं? एक वक़्त था जब घर के बुज़ुर्गो से परिवारिक फैसलों पर सलाह-मशविरा लिया जाता था या घर का बड़ा सदस्य खाना नही खा लेता तब तक खाना शुरु नहीं होता था. एक संयुक्त परिवार का बुज़ुर्ग घर का वो धागा होता था जो सभी को एक दूसरे से जोड़कर रखता था. लेकिन इस आधुनिक समाज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी ने इंसान को मशीन बना दिया और बाहरी चकाचौंध ने आँखों पर भौतिक सुखों की प्राप्ति की पट्टी बाँध दी है. जिसके परिणामस्वरुप आपसी  रिश्तों में ठंडेपन को बखूबी से महसूस किया जा सकता है और इसका सीधा असर बुज़ुर्गो पर पड़ रहा है.
बदलाव प्रकृति का नियम है और इसे नकारा नहीं जा सकता. ये जीवन के सभी पड़ावों में आता है जिसमें उम्र भी शामिल है और इस नियम पर कुदरत का भी ज़ोर नहीं. जो आज बच्चा है वो एक दिन जवान होगा और जो जवान है वो भी एक दिन बुज़ुर्ग बनेगा. अगर हम फिर भी बुज़ुर्गो को किसी तरह से दुख पहुंचाते हैं या उनपर अत्याचार करते हैं तो हमें खुद पर शर्म आनी चाहिए क्योंकि परिवार का बुज़ुर्ग खुद में ही एक विरासत होता है. आखिर इस बात को परिवार के अन्य सदस्य क्यों नहीं समझ पाते ? क्यों बोझ समझकर दूर रहने के लिए इन्हे मजबूर किया जाता है ?
“ पिछले 50 साल में भारत की जनसंख्या लगभग तीन गुनी हो गई है लेकिन बुज़ुर्गो की संख्या चार गुना से भी ज्यादा हुई हैं. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में बुज़ुर्गो की संख्या 7 करोड़ 70 लाख थी और 2011 की जनगणना में बताया गया कि यह संख्या 10 करोड़ को पार कर जाएगी. पीछले एक दशक में भारत में वृद्ध लोगों की आबादी 39.3 प्रतिशत की दर से बढ़ी हैं. यह 1950 से अबतक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी. आगे आने वाले दशकों में 45-50 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है. दुनिया के ज़्यादातर देशों में बुज़ुर्गो की संख्या दोगुनी होने में 100 साल से ज़्यादा का वक़्त लग गया पर भारत में इनकी संख्या 20 साल में ही दोगुनी हो गयी."
आज घरों में बच्चों का मन लगाने के लिए पेट्स पाले जाते हैं वहीं परिवार के बुज़ुर्ग सदस्य काे अनदेखा कर दिया जाता हैं. एक वक़्त था...कहा छोटे बच्चे अपने दादा-दादी के साथ खेलते थे, उनसे अच्छी बाते सीखते थे पर अब तो कई घर ऐसे भी मिल जाते हैं जहां बच्चे अपने दादा-दादी को देख ही नहीं पाये. उन्हे लगता हैं कि दादा-दादी डायनासोर की तरह विलुप्त हो गए हैं. खैर इसे ज्वाइंट फैमली या संयुक्त परिवार के पतन का नतीजा कहा जा सकता हैं.
Source: The Indian Express

आज का युवा वर्ग पढ़ाई और नौकरीपेशा के लिए गांव या छोटे शहरों को छोड़कर बड़े शहरो में बस रहा हैं.. ये भी एक बड़ी वजह हो सकती हैं परिवार से दूर होने की. शादी के बाद सास-ससुर से बहूं की नोंक-झोंक या शादी के बाद एकल परिवार की धारणा या यूं कहे कि नई पीढ़ी के साथ सोच का ना मिलना भी बुज़ुर्ग सदस्य से दूरी की वजह बन गई है.
Source: Localpad
एक कहावत हैं कि मां-बाप मिलकर 10 बच्चों को पाल लेते हैं लेकिन 10 बच्चे मिलकर भी मां-बाप को नहीं पाल पाते. मां-बाप जो पूरा जीवन इस काम में बिता देते हैं कि उनके बच्चे उनकी दिन-रात की मेहनत से कामयाब बन सकें.. वही बच्चा बड़ा होकर मां-बाप पर ध्यान नहीं देता या उन्हे वृद्ध आश्रम में भेज देता है ये सोचे बिना कि इस उम्र में उनका शरीर और मन कमजोर हो जाता है. अपने जीवनसाथी की मौत के बाद तो वो और अकेलापन और हीन भावना के शिकार हो जाते हैं. उन्हे भावनात्मक सहारा की जरुरत होती हैं. कभी-कभी ये खुद ही घर छोड़ कर वृद्ध आश्रम में रहने चले जाते हैं..लेकिन वो खुशी से घर नही छोड़ते बल्कि थक-हारकर ये उनका आखिरी फ़ैसला होता है.


Source: Hindustan times


वृद्ध आश्रम में रहने वाले बुज़ुर्ग अपने बारे में बताने में कतराते हैं, बोलने के लिए शब्द खत्म हो जाते हैं, कुछ की बोलते-बोलते आंखे भर आती हैं, तो कुछ ने अपने आंसूओं को आंखों में हमेशा के लिए कैद कर लिया. ये समस्या अपने देश में ही नहीं विदेशों में भी हैं. पूरे विश्व में बुज़ुर्गो के खिलाफ अन्याय और दुर्व्यवहार के खिलाफ जागरुक करने के लिए 1991 से 1 अक्टूबर को अन्तराष्ट्रीय बुज़ुर्ग दिवस मनाया जाता हैं..जिसका मकसद था बुज़ुर्गो के अहमियत का अहसास दिलाना और समाज और परिवार में उनको उचित स्थान दिलाना.
Source: The Indian Express
आज इनके पास अनुभव हैं और इन्होंने ज़िन्दगी को हमसे ज़्यादा जिया हैं. आज के युवा वर्ग राष्ट्र को ऊंचाई पर ले जाने के लिए वरिष्ठ नागरिकों के अनुभवों से लाभ उठा सकते हैं. अपने जीवन की इस अवस्था में उन्हे देखभाल और यह अहसास कराए जाने की जरुरत हैं कि वे हमारे लिए कितना ख़ास महत्व रखते हैं... आज़ादी के जश्न में इन्हे भी शामिल करे और इनका सम्मान करे दिल से..!

नोट: यह लेख मेरे एक वृद्ध आश्रम के दौरे पर अाधारित हैं. हर सिक्के के दो पहलू होते हैं इसलिए इस मुद्दे पर पार्ट-2 भी लिखूंगा उसका इन्तेज़ार करे.. आपको यह ब्लॉग कैसा लगा कमेंट में बताए और उचित लगे तो शेयर भी करे. धन्यवाद

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